वेंस ने क्या कहा?
वेंस ने All-In Podcast में H-1B व्यवस्था पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि यदि कोई तकनीकी कंपनी H-1B कर्मचारी के लिए आवेदन करती है तो वह वास्तव में ऐसा व्यक्ति हो, जो अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र या अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे सके। उनके अनुसार, H-1B का उद्देश्य केवल कम लागत पर कर्मचारी उपलब्ध कराना नहीं होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई कंपनी किसी अमेरिकी कर्मचारी को हटाकर उससे कम वेतन पर विदेशी कर्मचारी रखने की कोशिश करती है तो ऐसी स्थिति H-1B कार्यक्रम के मूल उद्देश्य से मेल नहीं खाती। वेंस ने यह भी कहा कि प्रशासन ऐसी कंपनियों को रोकने के उपाय तलाश रहा है जो एक तरफ H-1B कर्मचारियों की मांग करती हैं और दूसरी तरफ अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी करती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रशासन द्वारा किए जा रहे कुछ कदमों को कानूनी चुनौती भी मिली है।
H-1B कार्यक्रम क्या है?
H-1B अमेरिका का एक गैर-आप्रवासी वीजा कार्यक्रम है, जिसके माध्यम से अमेरिकी कंपनियां विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को रोजगार दे सकती हैं। तकनीक, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस और कुछ अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।
कानूनी वार्षिक सीमा सामान्य श्रेणी में 65,000 H-1B वीजा और अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उन्नत डिग्री हासिल करने वालों के लिए अतिरिक्त 20,000 है। USCIS ने जुलाई 2026 में पुष्टि की थी कि वित्त वर्ष 2027 के लिए दोनों वैधानिक कैप तक पर्याप्त आवेदन प्राप्त हो चुके हैं।
सबसे बड़ा बदलाव,भारी शुल्क
ट्रंप प्रशासन ने H-1B व्यवस्था पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए बड़े शुल्क का रास्ता भी अपनाया है। प्रशासन ने पहले नए H-1B मामलों से जुड़े 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था की थी। इसके बाद प्रशासन ने 1,03,265 डॉलर का नया प्रस्ताव भी रखा है। रिपोर्टों के अनुसार प्रस्तावित शुल्क विशेष रूप से cap-subject H-1B petitions पर लागू होगा, जबकि विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और कुछ गैर-लाभकारी संस्थानों को अलग-अलग प्रावधानों के तहत छूट मिल सकती है। प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी गई हैं और इसे अंतिम नियम बनने के लिए आगे की प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसका मतलब यह है कि हर H-1B कर्मचारी से सीधे 1,03,265 डॉलर वसूलने की बात नहीं है; शुल्क का दायित्व मुख्य रूप से संबंधित नियोक्ता और विशेष श्रेणी की H-1B petition पर निर्भर करता है।
अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी
वेंस के बयान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कंपनियों द्वारा अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी से जुड़ा है। उनका कहना है कि यदि कोई कंपनी अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रही है, तो उसी समय विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए H-1B व्यवस्था का इस्तेमाल करने पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी व्यापक नीति के तहत प्रशासन ने H-1B और अन्य वीजा धारकों के नौकरी जाने के बाद मिलने वाली 60 दिन की grace period को खत्म करने का प्रस्ताव भी रखा है। यह प्रस्ताव अभी अंतिम नियम नहीं है और सार्वजनिक टिप्पणी की प्रक्रिया से गुजर रहा है।
भारतीय पेशेवरों पर क्यों पड़ेगा असर?
H-1B व्यवस्था में भारतीय पेशेवरों की बड़ी भागीदारी है। उपलब्ध रिपोर्टों में बताया गया है कि स्वीकृत H-1B लाभार्थियों में लगभग 71 प्रतिशत भारत से आते हैं। इसलिए अमेरिकी H-1B नीति में बदलाव का भारतीय IT पेशेवरों, इंजीनियरों और तकनीकी कंपनियों पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है।
नई फीस और अन्य संभावित प्रतिबंधों से अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत से कर्मचारियों को H-1B के जरिए अमेरिका भेजना महंगा और अधिक जटिल हो सकता है। दूसरी ओर, कुछ विश्लेषणों का कहना है कि इससे कंपनियां भारत में ही अधिक उच्च-कौशल वाली नौकरियां और Global Capability Centres (GCCs) विकसित कर सकती हैं।
H-1B को लेकर अमेरिका में मूल बहस दो मुद्दों के बीच है।
प्रशासन का तर्क:
H-1B का इस्तेमाल अमेरिकी श्रमिकों को हटाकर सस्ता विदेशी श्रम लेने के लिए नहीं होना चाहिए। प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी कंपनियों को पहले घरेलू कर्मचारियों को प्रशिक्षित और नियुक्त करने पर ध्यान देना चाहिए तथा विदेशी प्रतिभा का इस्तेमाल उन क्षेत्रों में होना चाहिए जहां विशेष और उच्च स्तर की क्षमता की आवश्यकता हो।
आलोचकों की चिंता:
व्यापार और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े कुछ समूहों का तर्क है कि बहुत अधिक शुल्क और प्रतिबंध अमेरिका के लिए वैश्विक प्रतिभा आकर्षित करना कठिन बना सकते हैं। कुछ विश्लेषणों के अनुसार कंपनियां ऐसी स्थिति में अमेरिका के बजाय भारत, कनाडा या अन्य देशों में तकनीकी काम बढ़ा सकती हैं।
