'मेक इन इंडिया' की सबसे बड़ी सफलता मोबाइल निर्माण में देखी गई है। साल 2014 में भारत में केवल 2 मोबाइल बनाने वाली फैक्ट्रियां थीं, जबकि आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता देश बन चुका है। एप्पल, सैमसंग जैसी वैश्विक कंपनियां अब भारत में अपने फ्लैगशिप फोन बना रही हैं और बड़े पैमाने पर निर्यात कर रही हैं।
· वैश्विक मोबाइल निर्माण में दूसरा स्थान : विनिर्माण क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन का घरेलू हिस्सा 2014 के 30% से बढ़कर अब 85% से अधिक हो चुका है।
· खिलौना उद्योग : घरेलू स्तर पर सुरक्षा मानकों और सीमा शुल्क में सुधार के कारण चीन से खिलौनों के आयात में 70% तक की गिरावट आई है, जबकि भारतीय खिलौनों का निर्यात 60% से अधिक बढ़ा है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: भारत जो कभी हथियारों का सबसे बड़ा आयातक हुआ करता था, आज रक्षा निर्यात में नए रिकॉर्ड बना रहा है। देश में निर्मित तेजस लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस मिसाइल, और आईएनएस विक्रांत जैसे विमानवाहक पोत भारत की सैन्य विनिर्माण क्षमता का प्रतीक बन चुके हैं। रक्षा निर्यात अब ₹21,083 करोड़ के पार पहुंच चुका है। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है। इसके साथ ही, नोएडा और धोलेरा जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार किया जा रहा है। जहाँ वित्तीय वर्ष 2014-15 में भारत का रक्षा निर्यात लगभग ₹1,940 करोड़ था, वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 तक यह ₹21,083 करोड़ के ऐतिहासिक सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है।
आर्थिक बदलाव: निवेश और निर्यात
अनुकूल कारोबारी माहौल के कारण भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं। रक्षा, रेलवे, और एविएशन जैसे क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोला गया। घरेलू खिलौना उद्योग में 'मेक इन इंडिया' के कारण चीन से होने वाले आयात में भारी गिरावट आई है और भारतीय खिलौनों का वैश्विक निर्यात कई गुना बढ़ गया है।
गेम-चेंजर नीतियां: PLI स्कीम और इंफ्रास्ट्रक्चर
14 प्रमुख क्षेत्रों (जैसे फार्मा, टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स) के लिए शुरू की गई इस योजना ने कंपनियों को भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन दिया। इसने भारत को वैश्विक दिग्गजों के लिए मुख्य विनिर्माण केंद्र बना दिया। पीएम गतिशक्ति और नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी से विनिर्माण को सुगम बनाने के लिए सड़कों, रेलवे और बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया गया, जिससे माल ढुलाई की लागत (Logistics Cost) और समय में कमी आई हैI
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण: चुनौतियाँ और आगे की राह
जहाँ एक तरफ इस पहल ने शानदार परिणाम दिए हैं, वहीं कुछ क्षेत्रों में अब भी सुधार की आवश्यकता है:
रोजगार सृजन : विनिर्माण क्षेत्र में निवेश तो बढ़ा है, लेकिन देश की विशाल कार्यबल के अनुपात में हाई-स्किल्ड और बड़े पैमाने पर मैन्युअल रोजगार के अवसर पैदा करना अब भी एक चुनौती है। छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए और अधिक तकनीकी और वित्तीय सहायता की आवश्यकता है ताकि वे बड़ी कंपनियों के साथ मजबूती से जुड़ सकें। सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक घटकों के लिए भारत अभी भी कुछ हद तक आयात (विशेषकर चीन से) पर निर्भर है, जिसे कम करने के लिए घरेलू स्तर पर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को और बढ़ावा दिया जा रहा है।
निष्कर्ष:
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के बयान के अनुसार, 'मेक इन इंडिया' अब केवल एक सरकारी नारा नहीं बल्कि एक आत्मनिर्भर भारत का रोडमैप बन चुका है. आगामी दशक में सेमीकंडक्टर मिशन, ग्रीन एनर्जी (हाइड्रोजन मिशन) और एआई (AI) संचालित विनिर्माण भारत को वैश्विक 'फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड' बनाने की ओर अग्रसर कर रहे हैं।
