क्यों फंसा पेंच? केंद्र की आपत्तियों के मुख्य कारण
केंद्र सरकार ने बिल के कुछ विशिष्ट कानूनी प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई हैI प्रस्तावित बिल के सेक्शन (B) में 'गुंडा' की परिभाषा के तहत उन व्यक्तियों को भी शामिल किया गया था, जो नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांसेज (NDPS) एक्ट, 1985 के तहत अपराध करते हैं, उकसाते हैं या इसे फाइनेंस करते हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि यह प्रावधान पहले से मौजूद विशेष केंद्रीय कानून PITNDPS Act, 1988 (नशीली दवाओं के अवैध व्यापार की रोकथाम अधिनियम) के निवारक हिरासत (Preventive Detention) ढांचे से सीधे टकराता है। चूंकि मादक पदार्थों की तस्करी के लिए केंद्रीय कानून में पहले से ही सख्त निवारक हिरासत की व्यवस्था है, इसलिए राज्य का यह ओवरलैपिंग कानून कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकता है।
क्या है इस 'एंटी-गुंडा' बिल में?
यह बिल जून 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा राज्य में संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए पारित किया गया था। बिल में आदतन अपराध करने वालों, जन सुरक्षा के लिए खतरा बनने वालों और अवैध मादक पदार्थों के व्यापार में शामिल लोगों को इस दायरे में रखा गया है। इसके अलावा अवैध खनन, रेत-पत्थर का अवैध उठान और वन्यजीव अपराधों को भी इसमें शामिल किया गया है।
तड़ीपार करने का अधिकार : इस कानून के तहत जिला मजिस्ट्रेट (DM), पुलिस कमिश्नर या DIG रैंक से ऊपर के पुलिस अधिकारी किसी भी संदिग्ध 'गुंडा' को एक साल के लिए किसी विशिष्ट क्षेत्र या जिले में प्रवेश करने से प्रतिबंधित (तड़ीपार) कर सकते हैं।
12 महीने तक बिना मुकदमे के हिरासत : प्रशासन को यदि लगता है कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है, तो उसे निवारक हिरासत (Preventive Detention) के तहत बिना मुकदमे के 12 महीने (1 वर्ष) तक हिरासत में रखा जा सकता है।
बिल से जुड़े अन्य विवाद और मौजूदा स्थिति
इससे पहले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से और विधानसभा में दावा किया था कि इस बिल को राज्यपाल की मंजूरी मिल चुकी है और यह कानून बन चुका है। उन्होंने यह भी कहा था कि 24 जुलाई को कोलकाता में हुए प्रदर्शनों के आरोपियों पर इसे लागू भी किया गया है। हालांकि, अब राष्ट्रपति द्वारा बिल लौटाए जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि यह अभी तक कानून नहीं बना था। इस बिल के कड़े प्रावधानों को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में तीन जनहित याचिकाएं (PIL) भी दायर की गई थीं, जिन्हें कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना यह अभी कानून नहीं है, इसलिए इस पर चुनौती देना समय से पहले है।
आगे क्या होगा?
राज्य प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, यह कोई राजनीतिक गतिरोध नहीं बल्कि एक तकनीकी मामला है। पश्चिम बंगाल सरकार अब केंद्र द्वारा उठाए गए बिंदुओं के आधार पर बिल के विवादित प्रावधानों में आवश्यक संशोधन करेगी। इसके बाद संशोधित बिल को दोबारा विधानसभा से पारित कराकर अंतिम मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा।
