एक अनोखा 'पैटर्न' और 23 लाख की चांदी
कानून के मुताबिक, SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज होते ही पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता यानी राहत राशि दी जाती है। संतोष कुमार ने इस कानूनी प्रावधान को एक अलग नजरिए से देखा। देखते ही देखते, उनके परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर दर्जनों मुकदमे दर्ज हो गए।
सरकारी खजाने से पैसा रिलीज होने लगा। कभी एक लाख, कभी डेढ़ लाख—करते-करते संतोष कुमार और उनके परिवार ने कुल 23,36,250 रुपये (23 लाख से अधिक) की राहत राशि अलग-अलग मामलों में डकार ली। इतना ही नहीं, करीब 10 से 12 और नए मामले जिला स्तरीय समिति के सामने राहत राशि के भुगतान के लिए कतार में लगे हुए थे।
लालच और अदालत की चौखट
कहते हैं न कि लालच की कोई सीमा नहीं होती। किसी मामले में समाज कल्याण अधिकारी ने नियम के तहत पूरी रकम के बजाय आधी रकम (75,000 रुपये) ही जारी की। संतोष कुमार को यह नागवार गुजरा। वे बाकी की बकाया राशि वसूलने के लिए अड़ गए। निचली अदालत ने जब उनकी याचिका खारिज कर दी, तो वे अपनी वकालत के दम पर सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गए। उन्हें उम्मीद थी कि कोर्ट से आदेश कराकर वे बची हुई रकम भी निकाल लेंगे।
लेकिन वे यह भूल गए कि न्याय की आंखें भले ही बंद हों, मगर उसके कान और विवेक हमेशा खुले रहते हैं।
जब खुला राज: हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ के सामने जब मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो राज्य सरकार के सरकारी वकीलों ने कोर्ट के सामने वो आंकड़े रखे जिसे सुनकर अदालत भी सन्न रह गई। कोर्ट को बताया गया कि एक ही परिवार ने मुकदमों की झड़ी लगाकर सरकारी खजाने से 23 लाख रुपये से ज्यादा की रकम निकाल ली है। यह सुनते ही हाईकोर्ट का रुख कड़ा हो गया। अदालत ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:
"बार-बार मुकदमे दर्ज कराना अपने आप में सीधे गलत साबित नहीं होता, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में दावे और इतनी बड़ी रकम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह एक ऐसा स्पष्ट पैटर्न है, जिसकी निष्पक्ष जांच होना बेहद जरूरी है।"
पूरे प्रदेश में हड़कंप: जांच के आदेश
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि इस कल्याणकारी कानून का उद्देश्य उन वास्तविक पीड़ितों की मदद करना है जो समाज में प्रताड़ित हैं, न कि इसे किसी के लिए कमाई का जरिया बनने देना।
अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसे मामलों की प्रदेशव्यापी जांच कराने का आदेश दे दिया, जहां लोग बार-बार राहत राशि का दावा कर रहे हैं। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि इस योजना की निगरानी के लिए एक प्रभावी व्यवस्था (Monitoring System) विकसित की जाए ताकि सरकारी खजाने और कानून का दुरुपयोग रोका जा सके।
संतोष कुमार जो कोर्ट में और पैसे लेने आए थे, उनके इस अति-उत्साह ने पूरे राज्य के फर्जी मुकदमों के सिंडिकेट की पोल खोल दी। अब उत्तर प्रदेश सरकार पूरे सूबे में इस बात की पड़ताल कर रही है कि कानून की आड़ में कितने लोगों ने खजाने को चूना लगाया है।
यह कहानी किसी कानून के गलत होने की नहीं, बल्कि एक पवित्र और सुरक्षात्मक कानून के व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किए गए 'मिसयूज' (दुरुपयोग) की है, जिस पर आखिरकार न्याय व्यवस्था ने अपना कड़ा हथौड़ा चला दिया।
