यह आदेश न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने राकेश प्रताप सिंह और 25 अन्य प्रभावित इंजीनियरों द्वारा दाखिल की गई याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के बाद पारित किया। इसके साथ ही अदालत ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के 28 जनवरी 2014 के उस आदेश को भी अधिकार क्षेत्र से बाहर (बिना क्षेत्राधिकार) बताते हुए रद्द कर दिया है, जिसके चलते यह पूरा कानूनी विवाद खड़ा हुआ था।
क्या था पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद उत्तर प्रदेश जल निगम में जूनियर इंजीनियरों के 470 स्वीकृत पदों पर वर्ष 2013 में शुरू हुई नियमित भर्ती प्रक्रिया से संबंधित है। चयन प्रक्रिया पूरी होने और नियुक्तियां दिए जाने के बाद, आरक्षित वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों ने आरक्षण नियमों को सही से लागू न करने का आरोप लगाते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी।
इस शिकायत के निस्तारण के लिए शासन स्तर पर एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया। समिति ने 15 जनवरी 2014 को सौंपी अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि छूटे हुए योग्य एससी (SC) और ओबीसी (OBC) अभ्यर्थियों को विभाग में उपलब्ध बाद की अतिरिक्त रिक्तियों पर समायोजित कर दिया जाए। समिति ने विशेष रूप से यह भी कहा था कि पूर्व में चयनित हो चुके सामान्य वर्ग के किसी भी जूनियर इंजीनियर को नौकरी से न हटाया जाए।
समिति की रिपोर्ट के विपरीत हुई कार्रवाई
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्रा ने अदालत को बताया कि जल निगम प्रशासन ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए 136 अतिरिक्त आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नौकरी पर रख लिया। इसके बाद स्वीकृत पदों की संख्या 470 के मुकाबले कुल नियुक्तियां बढ़कर 543 हो गईं। इस प्रशासनिक विसंगति को सुधारने के बजाय, विभाग ने नियमों के विपरीत जाकर 2 दिसंबर 2014 को सामान्य वर्ग के 73 जूनियर इंजीनियरों को सेवा समाप्ति का नोटिस थमा दिया।
अदालत की सख्त टिप्पणी: अधिकार सुरक्षित हैं
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विभाग की इस कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा:
- कोई धोखाधड़ी नहीं: सभी याचिकाकर्ताओं का चयन सक्षम प्राधिकारी द्वारा एक नियमित विज्ञापन और वैध चयन प्रक्रिया के माध्यम से स्वीकृत पदों पर किया गया था। उनके चयन में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, हेरफेर या गलत बयानी का कोई आरोप नहीं है।
- कानून के विपरीत कार्रवाई: आरक्षण के नियमों को सही तरीके से लागू करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। अधिकारियों द्वारा भर्ती प्रक्रिया के दौरान की गई किसी भी तकनीकी या प्रशासनिक चूक को ठीक करने के नाम पर, पहले से वैध रूप से काम कर रहे नियमित कर्मचारियों को नौकरी से बेदखल नहीं किया जा सकता।
- पूर्व आदेश का उल्लंघन: कोर्ट ने यह भी नोट किया कि साल 2014 में ही हाई कोर्ट ने इन बर्खास्तगी आदेशों को पहली बार रद्द करते हुए पुनर्विचार के निर्देश दिए थे, जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती न दिए जाने के कारण वह आदेश अंतिम और जल निगम पर बाध्यकारी हो चुका था। इसके बावजूद नए सिरे से कारण बताओ नोटिस जारी कर की गई कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
फैसले का असर: हाई कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के बाद पिछले 12-13 वर्षों से मानसिक और कानूनी लड़ाई लड़ रहे इन 73 इंजीनियरों के परिवारों को बड़ा संबल मिला है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले से यह विधिक सिद्धांत एक बार फिर मजबूत हुआ है कि विभाग अपनी गलतियों का बोझ अपने निर्दोष कर्मचारियों के कंधों पर नहीं डाल सकता।

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